बाजार से सच्ची दोस्ती रखे

बाजार से सच्ची दोस्ती रखे

मंदी कल में बाज़ार से मुँह नहीं मोड़े

यह है दोस्ती कि दास्तां –

यह एक सामान्य सी अवधारणा है कि जब किसी वयक्ति के दिन खराब होते है या उस पर विपत्तियों के साये मंडरा रहे होते है, तो लोग धीरे धीरे उससे कटने लगते है, यहाँ तक कि आपातकाल में जब उसे ज्यादा सहयोग कि जरुरत होती है, तो आमतौर  पर साथ रहने वाले मित्र भी दूरी  बनाने लग जाते है, लेकिन ऐसे लोग न तो ' सच्चा दोस्त ' कहलाने का हक़ रखते है और न ही यह सच्ची दोस्ती निभाने कि परिभाषा में आते है बाज़ार पर भी यह सोच लागु होती है |

बाज़ार जब टुटने लगता है, बाज़ार में मंदी कि गिरफ्त में आने लगता है, तो निवेशको के हौसले भी डगमगाने लगते है और वे बाज़ार से मुँह मोड़ने लगते है| यही नहीं सामान्यतः जब बाज़ार का ग्राफ नीचे कि और आता दिखता है, तो जैसे – तैसे बाजार टूटता जाता है, वैसे वैसे निवेशक बाजार से पैसा निकलने कि जुगत में लग जाते है|  ऐसे समय में बाजार में नया निवेश आना भी शर्नेः शर्नेः बंद सा होने लग जाता  है  या निवेश दर लगातार घटती जाती है| इसके विपरीत जब बाजार उठने लगता है, पहिया तेजी  कि और बढ़ने लगता है, तो निवेशक भी जुटने लगते है, और लोग बाजार में बढ़- चढ़कर पैसा लगाने लगते है ।

मूलतः यह प्रवृर्ति शेयर बाजार अथवा इक्विटी  बाजार जिनमे  म्यूच्यूअल फंड्स, एनएवी आधारित सिक्योरिटीज या मार्केट इंडेक्स आधारित इन्वेस्टमेंट प्लान्स में दिखाई देती है तथापि कमोडिटीज ( एमसीएक्स / एनसीडीएक्स ) बाजार हो, प्रॉपर्टी बाजार हो, स्वर्ण , बहुमूल्य धातु व रत्न बाजार हो या प्रतयक्ष खरीद –  बेचान का बाजार हो- कमोबेश सभी बाजारों में निवेशको में यह कमजोरी  देखने को मिलती है । जाहिर है जब  बाजार संकट में होता है तो निवेशक उसका साथ देने के बजाय, उससे पीछा छुड़ानेको तैयार हो जाते है वास्तव में यह बाजार से सच्ची दोस्ती नहीं है |

निवेश बाजार को जब पैसे कि सबसे ज्यादा जरुरत का समय आता है, तो निवेशक आम तोर पर निवेश मे जोखिम समझ कर बाजार से दूर भागने लगते है । यह बाजार का मंदी का काल होता है , कठिनाई के इस दौर में बुद्धिमान निवेशक बाजार से सच्ची दोस्ती कि मिसाल कायम करते हुए बाजार  नीचे की और होने पर उसका सही मायने में साथ देते है । ऐसे निवेशक मंदी में बाजार से खरीद करना मुनासिब समझते है । यह तय है कि जो निवेशक बाजार कि बदहाली में साथ नहीं छोड़ते है, बल्कि इसे अनुकूल खरीद समय भापते हुए पैसा लगते है तो बाजार भी ऐसे निवेशक को लाभ देता है ।

संकट में करो सहयोग –

परिस्थितियाँ जब विपरीत हो दूसरे शब्दो में संकटकाल हो तो ऐसे समय में साथ निभाना ही सच्ची दोस्ती होती है। इंसानी रिश्तो में शादी – ब्याह या ख़ुशी के अन्य अवसरों पर पहुँच पाना बहुत जरुरी नहीं होता हे, लेकिन तीये कि बैठक हो या किसी के गम का माहोल हो तो जाना ही पड़ता हे।  ख़ुशी या रौशनी कि चकाचौंद में शामिल होने से ज्यादा किसी के दुःख कि घडी में शामिल होने को ज्यादा तबज्जो मिलती हे – यही बात बाज़ार पर भी सटीक बैठती हे। इस समय सेंसेक्स अथवा  मार्केट इंडेक्स नीचे है – ऐसा समय बाजार में खरीद के लिए सबसे उपयुक्त होता है । निवेश के लिए यह बुनियादी सूत्र है कि जब बाजार  में जोखिम ज्यादा लगता हो, तब हकीकत में जोखिम कम होता है| इसलिए मंदी के माहौल में बाजार में पैसा पैसा लगाकर या खरीद फरोख्त करने में लाभ कि संभावनाएँ ज्यादा बढ़ जाती है । तेजी कि रोशनी से चकाचौंद बाजार में पैसा नहीं भी लगाएँ तो चलेगा, लेकिन बाजार कि विकट  परिस्थितियो में या टूटत के समय का निवेश, कमाई का सही आधार बनकर उभरता है । वैसे भी यथार्थ को स्वीकारना चाहिए कि भूकम्प कि तरह बाजार निचले स्तर पर या मंदी के पायदान पर बहुत कम समय के लिए ही रहता है ।

इस तथ्य को सत्यम कंप्यूटर के उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है । एक समय था जब सत्यम कंप्यूटर का शेयर 360 रुपये  के स्तर पर था, लेकिन जैसे ही सॉफ्टवेयर कंपनी को प्रॉपर्टी कंपनी में मर्जर कि बात हुई तो यह बुरी तरह पछाड़ खा गया और शेयर 160 रुपये के स्तर  पर आ थमा । इसके साथ ही रामलिंगम राजू का घोटाला उजागर होते होते 5 से 7 दिन के अंतराल में बाजार पर हावी रहने

वाला यह शेयर लगातार टूटत कि तरफ बढ़ता गया और क्रमशः 80 रुपये, 40 रुपये , 20 रूपये, 12 रुपये और यहाँ तक कि 6 रूपये के सर्वाधिक निचले स्तर तक यह शेयर लुढकता चला गया । हर स्तर

पर निवेशक इसमें निवेश करते रहे । 6 रूपये पर कारोबार बमुश्किल 2-3 सेकंड ही रह पाया । 10 से 12 रुपये में 2 घंटे के करीब कारोबार हुआ तथा उसी दिन शेयर 18 रूपये पर पहुंच गया \ केंद्र सरकार

के हस्तक्षेप के बाद तो यही शेयर 35-40 रूपये के स्तर पर पहुंच  गया ।

सत्यम के उदाहरण से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि कम मूल्य यथा 6 रूपये , 10 रूपये या 12 रूपये पर यह शेयर थोड़े से समय ही रह पाया ।  जाहिर है बाजार  निचले स्तर  पर कम ही रहता है –

ऐसे समय में जो निवेशक उपलब्ध तरलता तथा अपनी जोखिम क्षमता का आंकलन  कर निवेश कर लेता है, तो मुनाफा ज्यादा मिलने कि संभावना  रहती है ।

यधपि ग्लोबल अर्थव्य्वस्था में बाजार  का पूर्वानुमान निवेशको के लिए ही क्या बाजार  के विश्लेषको तथा विशेषज्ञों के लिए भी असंभव सा हो गया है । विश्व के किस कोने में कौनसी  घटना से बाजार प्रभावित हो जाए – इसका मूल्यांकन  नहीं किया जा सकता है, लेकिन तजुर्बेकारों  का यह मूल्यांकन  अवश्य फलीभूत होता है कि मंदी के निवेश में ही कमाई होती है । तेजी के दौर में किया गया निवेश या तो बहुत कम लाभ – प्रदायक होता है , और कभी कभी तो जोखिम में भी डाल देता है । पाँच  वर्षो कि SIP में 60 महीनो का निवेश सम्मिलित होता है । हो सकता है निवेशक कि इन 60 महीनो में से 40 महीने कि खरीद प्पर कोई खास बचत नहीं हो रही हो लेकिन इस बीच मंदी के 20 महीने कि खरीद पूरी SIP को बेहतर फायदे में ला छोड़ती है ।

इसलिए बाजार  में बने रहने के लिए, लाभ कमाते रहने के लिए तेजी के साथ – साथ बाज़ार कि मंदी के समय भी हौसला  बनाये रखें । ऐसे समय यदि आप बाजार  का साथ देंगे तो निश्चित रूप से बाजार

भी आपका साथ देगा ।

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